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यह अजीब दौर नहीं है, इस दौर के लिए जो तैयारी की गई है उसका अंजाम है : रवीश कुमार

ravish kumar tripura violence
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Ravish Kumar On Tripura Violence : त्रिपुरा की घटना (Tripura Violence) हो या गुरुग्राम की, आप किसी को किसी से अलग नहीं कर सकते न आर्यन ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद कही गई बातों को क्रिकेटर शमी को कही गई बातों से अलग कर सकते हैं। ऐसी घटनाओं को अंजाम देने के लिए हर तरफ़ संगठित भीड़ खड़ी कर दी गई है। इनमें से एक में भी बीजेपी का नाम सुनाई नहीं देगा लेकिन बीजेपी की जीत के लिए काम करने वाले संगठनों के नाम सुनाएँगे।

इस तरह से हिंसा का यह काम ऐसे संगठनों और जनता के बीच बनी स्वतःसंगठित भीड़ के हवाले छोड़ दिया गया है। ऐसी घटनाओं का स्केल और रेंज इतना बड़ा हो चुका है कि आप लाख कोशिश कर लें कुछ न कुछ छूटता है। छूटेगा। दिल्ली में ही हो रही इस तरह की घटनाएँ पकड़ में नहीं आती। दिल्ली दंगों को लेकर जिस तरह की जाँच हुई है वह भी छूटता ही जा रहा है। कितनी चीज़ों पर कहां कहां कोई समेटे।

मुख्यधारा के मीडिया के पास अब न रिपोर्टर है और न रिपोर्टिंग का बजट। जो बोल रहा है उसी पर बोलते रहने का भार लादा जा रहा है।त्रिपुरा की घटना को नज़रअंदाज़ भी किया गया है लेकिन इसके कई कारणों में एक कारण यह भी है।

अब सारा सवाल कवरेज़ होने या न होने,पोस्ट लिखने या न लिखते पर आकर टिक गया है। इस पूरी बहस में वह व्यवस्था ग़ायब है जिसकी ज़िम्मेदारी है नागरिकों के हक़ों की रक्षा करना।कितना आसान हो गया है कि किसी मस्जिद पर हमला कर दीजिए और कह दीजिए कि पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाया जा रहा था। पाकिस्तान ज़िंदाबाद बोला जा रहा था।

यह अजीब दौर नहीं है। इस दौर के लिए जो तैयारी की गई है उसका अंजाम है। रोज़ ही यहाँ लिखता हूँ। रोज़ ही आप पढ़ते हैं लेकिन हिंसा की मशाल लिए यह राजनीति रुकने का नाम नहीं ले रही है। ऐसा लगता है कि इसका एक ही मक़सद है सांप्रदायिकता का विस्तार। इतना व्यापार कर दिया जाए कि केवल बोलने और न बोलने वाला अपराधी कहे जाने लगें, जो अपराध कर रहे हैं वो किसी की साइड खड़े होकर देवता बन जाएँ।

मैं बांग्लादेश पर न लिखूँ या त्रिपुरा पर न लिखूँ, जो लिख रहा हूँ, बोल रहा हूँ उसमें हमेशा ही ऐसी घटनाओं को लेकर चिन्ताएँ शामिल रही हैं। वो काफ़ी नहीं है तो कुछ भी काफ़ी नहीं है और हिंसा का यह दौर अनंत असीमित होता जा रहा है।त्रिपुरा पर ख़ुद भी पढ़ने के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ीं।

थोड़ा बहुत द वायर हिन्दी में ही एक दो लेख मिले। स्क्रोल में भी रुददेब शाहिद ने लिखा है। हर जगह की रिपोर्टिंग में पूरी बात नहीं है। वायर में एक्सप्रेस को कोट किया गया है। यह एक नया चलन है। इसी तरह संसाधनों की कमी पूरी हो रही है। मैं लिखूँगा तो एक्सप्रेस से लेकर वायर और स्क्रोल को कोट करूँगा। – Ravish Kumar On Tripura Violence

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