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PM मोदी के ‘हनुमान’ का छलका दर्द, बोले- संकट में BJP ने मुझे अकेला छोड़ दिया

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चाचा पशुपति पारस से सियासी लड़ाई लड़ रहे चिराग पासवान के मन का एक और मलाल बाहर आया है। अंग्रेजी अखबार द हिंदू को दिए खास इंटरव्यू में चिराग पासवान ने इस बात का खुलकर जिक्र किया है। पीएम मोदी के ‘हनुमान’ चिराग पासवान को इस बात का दर्द है कि संकट में बीजेपी ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। पढ़िए और क्या-क्या कहा चिराग ने.. जब चिराग पासवान से ये सवाल पूछा गया कि क्या उनका समीकरण गड़बड़ हो गया क्योंकि उन्होंने बिहार चुनाव में NDA को नुकसान पहुंचा दिया। क्या इसी वजह से बीजेपी ने भी उनका साथ छोड़ दिया?

हां, मुझे लगता है कि उन्होंने मुझे छोड़ दिया है। बीजेपी से किसी ने भी मुझसे संपर्क नहीं किया है। यह दुख की बात है, क्योंकि मैंने और मेरे पिता रामविलास पासवान ने पूरे दिल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के वरिष्ठ नेतृत्व का तब समर्थन किया जब कोई भी नरेंद्र मोदी जी से हाथ मिलाने को तैयार नहीं था। जब नीतीश ने BJP का साथ छोड़ा तो मेरे पिता ही थे जो राम मंदिर हो, अनुच्छेद 370, सीएए और तीन तलाक पर BJP के साथ खड़े थे।

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क्या आपको बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में अकेले जाने और जेडीयू के खिलाफ प्रचार करने के अपने फैसले पर पछतावा है? – हरगिज नहीं। मुझे अपने राज्य के लोगों से जिस तरह का समर्थन मिल रहा है, वह सिर्फ इसलिए है क्योंकि मैंने वह चुनाव अकेले लड़ा था। हर कोई नीतीश कुमार का विकल्प चाहता था। एलजेपी को गठबंधन में केवल 15 सीटों की पेशकश की गई थी। अगर मैं इसके लिए राजी हो जाता, तो अगले चुनाव के समय तक एलजेपी के पास एक ही विकल्प बचा होता कि हमारा किसी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय पार्टी में विलय हो जाता। इसके अलावा, आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ आगे नहीं बढ़ सकते जो आपकी विचारधारा का सम्मान नहीं करता है। नीतीश कुमार किसी अन्य सहयोगी को जगह दिए बिना अपना एजेंडा तय करना चाहते हैं।

चिराग पासवान ने आगे कहा कि ‘गठबंधन सरकारें न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर चलती हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं किसी ऐसे व्यक्ति के साथ कैसे जा सकता हूं जिसने मेरे पिता को अपमानित किया है, उन्हें बदनाम करने, हराने और नष्ट करने की कोशिश की है? यह पहली बार नहीं है जब वह मेरी पार्टी तोड़ रहे हैं। उन्होंने 2005 में ऐसा किया था, जब उन्होंने फरवरी के चुनाव के बाद एलजेपी विधायकों पर डोरे डाले। ठीक ऐसे ही उन्होंने उन्होंने मटिहानी से जीतने वाले एलजेपी विधायक को छीन लिया। यह उनकी आदत रही है।’

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एलजेपी से अलग होने के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं? बीजेपी है या जेडीयू? – यह एक विडंबनापूर्ण प्रश्न है। जब मेरे ही परिवार के सदस्यों ने मुझे छोड़ दिया तो मैं किसी को कैसे दोष दूं? लेकिन जैसा कि मैंने कहा, जेडीयू हमेशा पार्टियों को तोड़ने में आगे रहा है। खासतौर पर विशेष रूप से जेडीयू हमेशा से ही दलित नेतृत्व को बांटती रही है। वे मेरे पिता के पीछे थे और अब मेरे विरुद्ध हैं। उन्होंने दलितों और महादलितों को विभाजित किया, जिससे अनुसूचित जातियों में एक उप-विभाजन हुआ। वे यह स्वीकार नहीं कर सकते कि एक दलित इतनी मजबूत स्थिति में है। मुझे 25 लाख वोट और 6% वोट शेयर मिले। यह तब हुआ जब मैंने सभी 243 सीटों पर नहीं बल्कि केवल 135 सीटों पर चुनाव लड़ा था।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बिना किसी देरी के पशुपति नाथ पारस के संसदीय नेता के दावे को मान्यता दी। क्या यह स्पष्ट रूप से तख्तापलट में बीजेपी के हाथ का संकेत नहीं देता है? – मैं लाइनों के बीच पढ़ना नहीं चाहूंगा। मैं शनिवार को ओम बिड़ला से मिला और मैंने संसदीय नेता के चयन की एलजेपी की प्रक्रिया के बारे में बताया । मैंने उनसे कहा था कि यह निर्णय लेने से पहले उन्हें कम से कम मुझसे बात करनी चाहिए थी। यहां तक कि संसद की नियम पुस्तिका भी इसे बहुत स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है, कि संसदीय दल के नेता को पार्टी के जरिए तय किया जाना है, सदस्यों के जरिए नहीं। सांसद आ सकते हैं और जा सकते हैं। पार्टियां यहां रहने के लिए हैं।

पारस गुट ने आप पर निरंकुशता का आरोप लगाया है? – अगर मैं निरंकुश होता तो मुझे एलजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 66 सदस्यों का समर्थन नहीं मिलता। पांच सांसदों सहित राष्ट्रीय कार्यकारिणी के केवल नौ सदस्यों ने पार्टी छोड़ी। 135 उम्मीदवारों में से 114 ने मुझे समर्थन का खुला पत्र सौंपा है। उनके साथ बिहार में सिर्फ चार जिलाध्यक्ष गए हैं. अगर मैं निरंकुश था, तो उनमें से बहुतों ने मेरे साथ रहने का फैसला क्यों किया।

चिराग पासवान आगे क्या करने वाले हैं? – मैं बिहार के लोगों के पास वापस जाऊंगा। मुझे अब उनके आशीर्वाद की जरूरत है कि मेरे अपने बड़ों ने मुझे धोखा दिया है। मैं इस लड़ाई को अंत तक लड़ने के लिए तैयार हूं। मेरे पास अपने दावे का समर्थन करने के लिए सभी कानूनी सबूत हैं। मैंने माननीय अध्यक्ष ओम बिड़ला जी से कहा कि मुझे उन पर भरोसा है, लेकिन मैं लड़ाई को सर्वोच्च मंच पर ले जाने के लिए तैयार हूं। मैं उस पार्टी को नहीं त्याग सकता जिसे मेरे पिता ने अपने पसीने और खून से बनाया है। इन लोगों ने मेरे साथ विश्वासघात नहीं किया है, उन्होंने मेरे पिता को धोखा दिया है।

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सोर्स – navbharattimes.indiatimes.com


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