Politics

सावरकर 11 जुलाई 1911 को अंडमान पहुंचे थे और 29 अगस्त 1911 को ही अपना पहला माफीनामा…

20220719 123346 min
आर्टिकल को शेयर ज़रूर करें :-

गांधी स्मृति और दर्शन समिति की हिन्दी मासिक पत्रिका ‘अंतिम जन’ में विनायक दामोदर सावरकर पर विशेषांक छपा है। केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन आने वाली गांधी स्मृति और दर्शन समिति की पत्रिका में सावरकर के योगदान को गांधी के बराबर बताया है। गांधी के जीवन और दर्शन के प्रचार-प्रसार के लिए गठित समिति की इस पत्रिका में गांधी से संबंधित सिर्फ तीन और सावरकर के बखाने वाले करीब 12 लेख प्रकाशित किए गए हैं।

समिति के संरक्षक और उपाध्यक्ष विजय गोयल ने भी इस अंक के लिए एक हस्ताक्षरित लेख लिखा है, जिसमें सावरकर को स्वातंत्र्य वीर बताते हुए यशोगान किया गया है। विजय गोयल के लेख में कई तथ्यात्मक त्रुटि बताई जा रही हैं। आइए एक-एक कर समझते हैं…

ये भी पढ़ें -: 500 का छुट्टा कराना था, मजबूरी में खरीदा लॉटरी टिकट, मिल गया इतने करोड़ का इनाम…

यातना सहते रहे लेकिन हारे नहीं : सेसुलर जेल में कैदियों को दी जाने वाली यातनाओं का जिक्र करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल ने लिखा है, ”… यातनाओं को सहने के बावजूद भी सावरकर थके नहीं, हारे नहीं, अपितु एक योद्धा की तरह आजादी की प्राप्ति तक संघर्ष करते रहे।” इस एक पंक्ति में कई तथ्यात्मक त्रुटियां हैं, जिसके ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं।

विजय गोयल जिन यातनाओं का जिक्र कर रहे हैं, वह सिर्फ सावरकर के लिए आरक्षित नहीं थे। अंग्रेज जिन्हें भी अंडमान-निकोबार स्थित सेल्युलर जेल यानी ‘काला-पानी’ की सजा सुनाते थे, सभी को उन यातनाओं सामना करना पड़ा था। किसी भी सामान्य मनुष्य का उन यातनाओं से टूट जाना अस्वभाविक नहीं है। लेकिन विजय गोयल का यह कहना है कि सावरकर ‘हारे नहीं’ यह पूरी तरह सही नहीं है।

ये भी पढ़ें -: कूड़े के ढेर में मिली मोदी-योगी की तस्वीर तो सफाई कर्मी को कर दिया बर्खास्त

सावरकर 11 जुलाई 1911 को अंडमान पहुंचे थे और 29 अगस्त 1911 को ही अपना पहला माफीनामा लिख दिया था। यानी सिर्फ डेढ़ महीने के भीतर ही वह टूट गए थे। उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई थी लेकिन वह 9 साल में 6 बार माफीनामा लिखकर, अंग्रेजों की शर्त पर जेल से बाहर आ गए थे। सावरकर पर शोध करने वाले निरंजन तकले ने यह जानकारी बीबीसी से बातचीत के दौरान साझा की है।

विजय गोयल ने लिखा है कि ‘सावरकर एक योद्धा की तरह आजादी की प्राप्ति तक संघर्ष करते रहे’ इस बात की भी इतिहास पुष्टि नहीं करता है। शुरुआत में सावरकर जरूर आजादी के लिए लड़ें लेकिन माफी मांगकर जेल से छूटने के बाद स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका का प्रत्यक्ष उदाहरण नहीं मिलता। अग्रेजों के खिलाफ देशव्यापी भारत छोड़ो आन्दोलन में सावरकर शामिल नहीं हुए थे।

ये भी पढ़ें -: स्मृति ईरानी औऱ अमित मालवीय पर केेस दर्ज, लगे है ये आरोप… पढ़ें विस्तार से

ये भी पढ़ें -: मोहम्मद जुबैर को सुप्रीम कोर्ट से राहत, यूपी में दर्ज सभी FIR में कार्रवाई नहीं करने के दिए आदेश


आर्टिकल को शेयर ज़रूर करें :-