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नूपुर शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के समर्थन में आया वकीलों का एक संगठन, कही ये बात…

20220701 123817 min
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वकीलों के एक संगठन ऑल इंडिया बार एसोसिएशन ने मंगलवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को पत्र लिख कर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नूपुर शर्मा पर की गई हालिया टिप्पणी का समर्थन किया है. एसोसिएशन के चेयरमैन आदिश अगरवाला ने पत्र लिखकर कहा है कि जो भी याचिका सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के खिलाफ दाखिल की जा रही है, उनको खारिज करना चाहिए. दरअसल, कई संगठनों और पूर्व जजों ने नूपुर शर्मा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी की आलोचना की है.

इस मामले में कई याचिकाएं भी दाखिल हुईं हैं, जिसमें मांग की गई है कि शीर्ष न्यायालय को अपनी मौखिक टिप्पणी वापस लेनी चाहिए. लेकिन आदिश अगरवाला का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने सही वक्त पर ये टिप्पणी की है. उन्होंने कहा, “जो हालत बन रहे हैं, उस पर सुप्रीम कोर्ट चुप नहीं रह सकता. नूपुर शर्मा एक वकील हैं और उनको ऐसे बयान नहीं देने चाहिए थे. शीर्ष अदालत ने लांघी ‘लक्ष्मण रेखा’ इससे पहले, पूर्व न्यायाधीशों और नौकरशाहों के एक समूह ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के खिलाफ उच्चतम न्यायालय की हालिया टिप्पणियों की निंदा करते हुए मंगलवार को आरोप लगाया कि शीर्ष अदालत ने इस मामले में ‘लक्ष्मण रेखा’ पार कर दी.

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पंद्रह पूर्व न्यायाधीशों, अखिल भारतीय सेवा के 77 पूर्व अधिकारी और 25 अन्य लोगों ने एक बयान पर हस्ताक्षर किए, जिसमें उन्होंने कहा है, ‘न्यायपालिका के इतिहास में, ये दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियां बेमेल हैं और सबसे बड़े लोकतंत्र की न्याय प्रणाली पर ऐसा दाग हैं, जिसे मिटाया नहीं जा सकता. इस मामले में तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाने का आह्वान किया जाता है, क्योंकि इसके लोकतांत्रिक मूल्यों और देश की सुरक्षा पर संभावित गंभीर परिणाम हो सकते हैं. न्यायालय ने शर्मा की विवादित टिप्पणी को लेकर विभिन्न राज्यों में दर्ज प्राथमिकियों को एक साथ जोड़ने संबंधी उनकी याचिका स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने (शर्मा ने) पैगंबर मोहम्मद के बारे में टिप्पणी या तो सस्ता प्रचार पाने के लिए या किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत या किसी घृणित गतिविधि के तहत की.

बयान में इन टिप्पणियों की निंदा करते हुए कहा गया है, ‘हम जिम्मेदार नागरिक के तौर पर यह मानते हैं कि किसी भी देश का लोकतंत्र तब तक ही बरकरार रहेगा, जब तक कि सभी संस्थाएं संविधान के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करती रहेंगी. उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाशीधों की हालिया टिप्पणियों ने लक्ष्मण रेखा पार कर दी है और हमें एक खुला बयान जारी करने के लिए मजबूर किया है. ‘भारत के संविधान की प्रस्तावना का उल्लंघन’ बयान में उल्लेख किया गया है कि शर्मा ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष न्याय प्रणाली तक पहुंच का अनुरोध किया था. इसमें कहा गया है कि अदालत की टिप्पणियों का न्यायिक रूप से याचिका में उठाए गए मुद्दे से कोई संबंध नहीं है और इन्होंने ‘न्याय प्रणाली के सभी सिद्धांतों का अप्रत्याशित तरीके से उल्लंघन किया है.

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इसमें कहा गया, ‘उन्हें (नूपुर को) न्यायपालिका तक पहुंच से वस्तुत: वंचित कर दिया गया था और इस प्रक्रिया में भारत के संविधान की प्रस्तावना, भावना और सार का उल्लंघन किया गया.’ बयान में दावा किया गया कि इन टिप्पणियों ने ‘उदयपुर में दिन-दिहाड़े सिर कलम करने के नृशंस कृत्य’ को अप्रत्यक्ष तरीके से छूट दे दी.

सुप्रीम कोर्ट ने नुपुर शर्मा को लगाई थी कड़ी फटकार उच्चतम न्यायालय ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से निलंबित नेता नूपुर शर्मा की पैगंबर मोहम्मद के बारे में विवादित टिप्पणी को लेकर उन्हें एक जुलाई को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि उनकी (नुपुर की) ‘अनियंत्रित जुबान’ ने ‘पूरे देश को आग में झोंक’ दिया. न्यायालय ने यह भी कहा कि ‘देश में जो कुछ हो रहा है उसके लिए शर्मा अकेले जिम्मेदार हैं.

टेलीविजन पर प्रसारित एक बहस के दौरान पैगंबर के बारे में की गई शर्मा की टिप्पणी के विरोध में देशभर में प्रदर्शन हुए थे और कई खाड़ी देशों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी. भाजपा ने बाद में शर्मा को पार्टी से निलंबित कर दिया था. न्यायालाय ने नुपुर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने वाली दिल्ली पुलिस की खिंचाई करते हुए कहा था, ‘अभी तक की जांच में क्या हुआ है? दिल्ली पुलिस ने अब तक क्या किया है? हमारा मुंह न खुलवाएं? उन्होंने आपके लिए लाल कालीन बिछाया होगा.

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