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गुजरात में RTI से जवाब मांगने वालों पर जुर्माना और बैन लगाया जा रहा, रिपोर्ट में दावा

20220810 093901 min
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गुजरात (Gujarat) में पिछले 18 महीनों में 10 लोगों को RTI फाइल करने से बैन कर दिया गया है. इतिहास में पहली बार RTI फाइल करने को लेकर पेटलाड शहर के हितेश पटेल और उनकी पत्नी पर 5 हजार का जुर्माना लगाया गया. वजह ये कि उन्होंने अपनी सोसाइटी से जुड़ी जानकारी के लिए 13 RTI फाइल की थी. बाकी लोगों को बैन करने की वजह दी गई कि वो ज्यादा सवाल दर्ज कराते हैं या सरकारी अधिकारियों को परेशान करने के लिए RTI का गलत इस्तेमाल करते हैं.

खबर के मुताबिक, ये आदेश जारी किए गुजरात के सूचना आयोग में मौजूद आयुक्तों द्वारा. RTI या Right to Information या सूचना का अधिकार. इसके अंतर्गत कोई भी नागरिक किसी भी सरकारी विभाग से कोई भी जानकारी ले सकता है. शर्त बस इतनी कि RTI के तहत पूछी जाने वाली जानकारी तथ्यों पर आधारित हो और RTI के लिए बने कानून के दायरे में आती हो. लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर मानें तो गुजरात में कुछ लोगों पर जुर्माना तो लगाया ही गया है, साथ ही उन पर आरटीआई फ़ाइल करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है.

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बता दें कि महति अधिकार गुजरात पहल नाम का एक एनजीओ है. ये एनजीओ एक आरटीआई की हेल्पलाइन चलाता है. जिसका काम आरटीआई आवेदनों और उन पर आई प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करना है. खबर के मुताबिक, अपनी जांच में एनजीओ ने पाया कि 10 मामलों में सूचना आयुक्तों ने मामले से संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि उन मुद्दों पर कोई जानकारी न दी जाए. गांधीनगर में पेठापुर की एक स्कूल टीचर अमिता मिश्रा को उनकी सर्विस बुक और सेलेरी डीटेल्स की जानकारी मांगने को लेकर बैन किया गया था. स्कूल के अधिकारियों ने शिकायत की थी कि अमिता 2 रुपये पर पेज का RTI शुल्क नहीं देती है और एक तरह के सवाल पूछती है.

मोडासा शहर में एक स्कूल कर्मचारी सत्तार मजीद खलीफा ने खुद पर संस्था द्वारा की गई कार्रवाई को लेकर सवाल पूछा था. उन पर भी बैन लगा दिया गया. कहा गया कि खलीफा RTI दाखिल करके स्कूल से बदला लेने की कोशिश कर रहा था. चिंतन मकवाना को भावनगर के मुख्य जिला स्वास्थ्य कार्यालय के बारे में जानकारी और वहां का सीसीटीवी फुटेज मांगने पर बैन किया गया. फिर मकवाना की पत्नी ने जानकारी मांगी तो उन पर और उनकी सास पर पांच साल का प्रतिबंध लगा दिया गया. वजह दी गई कि उनकी RTI दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोधी थी.

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इस मामले पर एनजीओ के पंक्ति जोग ने अखबार से कहा – “इन 10 मामलों की पड़ताल करने पर पता चलता है कि सूचना आयुक्त कई सारे केसों का हवाला देकर नागरिकों को सूचनाएं नहीं दे रहे हैं. इन केसों का सही संदर्भ जाने बगैर. कौन से केस है? 2008 के एनडी कुरेशी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के दिल्ली हाईकोर्ट केस, 2011 के आदित्य बंदोपाध्याय बनाम सीबीएसई, केन्द्रीय सूचना आयोग में चले टेलीकॉम विभाग बनाम एचके बंसल केस, और 2011 में चले शौनक सत्या बनाम ICAI केस.

इस पर भारत के पहले मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया- “ये आदेश न केवल विवादित हैं बल्कि पूरी तरह से अवैध भी हैं और इन्हें गुजरात हाई कोर्ट में जाकर चुनौती दी जा सकती है. सूचना आयोग एक नागरिक के लिए अपील की अंतिम अदालत है. आयोग ऐसे आदेश कैसे पारित कर सकता है जो कानून के बाहर हैं?” दिलचस्प बात यह है कि इस साल 18 जून को गुजरात के गृह विभाग ने एक RTI जवाब में कहा था कि RTI आवेदकों को ब्लैक लिस्ट करने या बैन करने के लिए कोई कानून नहीं है.

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