कभी 0 थे, आज 161 विधायक हैं, अरविंद केजरीवाल ने 10 साल में AAP को कैसे बनाया राष्ट्रीय पार्टी?

कभी 0 थे, आज 161 विधायक हैं, अरविंद केजरीवाल ने 10 साल में AAP को कैसे बनाया राष्ट्रीय पार्टी?
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6 अप्रैल 2011. दिल्ली का जंतर-मंतर. किशन बापट बापूराव उर्फ अन्ना हजारे ने जन लोकपाल कानून के लिए पहला अनशन किया. अन्ना की ये दिल्ली में पहली दस्तक थी. इतनी जोरदार कि सत्ता के गलियारे तक हिलते नजर आए. अन्ना हजारे के समर्थन में पूरा देश खड़ा हो गया. जगह-जगह आंदोलन शुरू हो गए. लोग अनशन करने लगे. अन्ना हजारे के साथ खड़ी इन हजारों-लाखों की भीड़ में एक चेहरा अरविंद केजरीवाल का भी था. अरविंद केजरीवाल को उस समय अन्ना का ‘अर्जुन’ भी माना जाता था, क्योंकि अन्ना हजारे के बाद वही दूसरे ऐसे थे जिन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, सरकार के खिलाफ खड़े हुए, अनशन किए. आज वही अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय राजनीति का अहम चेहरा बन चुके हैं.

अन्ना आंदोलन के दौरान कई ऐसे तस्वीरें आईं, जिसमें अरविंद केजरीवाल हाथ में तिरंगा लिए जन लोकपाल कानून बनाने की मांग करते दिखे. उन्हें कई बार गिरफ्तार भी किया गया. अन्ना आंदोलन लंबे वक्त तक चला. सरकार से कई बार बातचीत भी हुई. भूख हड़तालें हुईं. लेकिन इन सबके बावजूद जन लोकपाल कानून नहीं बन पाया. फिर आई 2012 की 2 अक्टूबर. वो तारीख जिस दिन अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान किया. सवाल भी उठे. तमाम नेताओं ने आरोप लगाया कि केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए आंदोलन का इस्तेमाल किया. हालांकि, केजरीवाल और उनके सहयोगियों का कहना था कि देश को भ्रष्टाचार से छुटकारा दिलाने का यही तरीका है कि वो राजनीति में जाएं और सिस्टम में घुसकर गंदगी को साफ करें.

आखिरकार 26 नवंबर 2012 को अरविंद केजरीवाल ने ‘आम आदमी पार्टी’ नाम से राजनीतिक पार्टी लॉन्च कर दी. अन्ना हजारे भी इसके पक्ष में नहीं थे. लेकिन उस समय अरविंद केजरीवाल ने कहा कि ‘सभी पार्टियों ने धोखा दिया है. सभी पार्टियां पर्दे के पीछे से एक-दूसरे की मदद करती हैं. जब तक राजनीति नहीं बदलेगी तब तक भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं मिल सकती. इसलिए हमने मजबूरी में आम आदमी पार्टी का गठन किया है. लेकिन ‘मजबूरी’ में शुरू हुई आम आदमी पार्टी आज देश की राष्ट्रीय पार्टी बन गई है. बीजेपी, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बाद चौथे नंबर की पार्टी है जिसके देश में सबसे ज्यादा विधायक हैं. दिल्ली और पंजाब में सरकार है. एमसीडी पर भी कब्जा हो गया है. गुजरात और गोवा में पार्टी की एंट्री हो चुकी है. राज्यसभा में चौथे नंबर की पार्टी है, जिसके सबसे ज्यादा सांसद हैं. पर ये सब हुआ कैसे? जानते हैं आम आदमी पार्टी का शुरुआत से अब तक का सफर…

2013 के आखिर में आम आदमी पार्टी चुनावी मैदान में उतरी. पार्टी ने दिल्ली की सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया. पहले ही चुनाव में सबको चौंकाते हुए आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की 70 में से 28 सीटों पर बाजी मार ली. अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को रिकॉर्ड वोटों के अंतर से हराया. लेकिन पार्टी बहुमत से दूर रह गई. बहुमत न मिलने की वजह से केजरीवाल ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई. इस गठबंधन सरकार में अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने.

लेकिन जल्द ही इस गठबंधन पर सवाल उठने लगे. सवाल उठे कि जिस आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा, बाद में उसी के साथ मिलकर सरकार बना ली. गठबंधन में भी बात बिगड़ने लगी और ये सरकार महज 49 दिन ही चली. 14 फरवरी 2014 को अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया और कहा कि विधानसभा में बहुमत नहीं है, इसलिए जन लोकपाल बिल पास नहीं करा पा रहे हैं, इसलिए फिर से चुनाव के बाद पूर्ण बहुमत के साथ लौटेंगे. अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. करीब सालभर तक राष्ट्रपति शासन रहने के बाद चुनावों का ऐलान हुआ. जिस आम आदमी पार्टी की उम्र महज दो साल थी, उसने दिल्ली की 70 में से 67 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया. जिस पार्टी के पास कभी कुछ नहीं था, उसने पूरी दिल्ली का दिल जीत लिया था.

2015 में सत्ता में आते ही केजरीवाल ने दिल्ली में बिजली-पानी फ्री कर दिया. कई योजनाएं शुरू कीं. लेकिन ये बहुमत ‘फूट’ भी लेकर आया. एक वक्त ऐसा आया जब प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव ने केजरीवाल पर ‘सुप्रीम लीडर’ होने का आरोप लगाया. पार्टी ने प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव समेत आनंद कुमार और अजीत झा जैसे नेताओं को निकाल दिया. इसके बाद कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल के रिश्ते बिगड़ने लगे. एक वक्त था जब कुमार विश्वास को अरविंद केजरीवाल अपना छोटा भाई बताते थे. रिश्ते बदतर तब हुए जब 2018 में कुमार विश्वास को राज्यसभा नहीं भेजा गया. बाद में कुमार विश्वास ने भी पार्टी छोड़ दी. कई और भी बड़े नेता पार्टी छोड़ते चले गए.

आम आदमी पार्टी से नेता छूटते जा रहे थे, लेकिन अरविंद केजरीवाल की छवि पर कुछ खास असर नहीं पड़ा. फरवरी 2020 में दिल्ली में जब विधानसभा चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी ने फिर चमत्कार कर दिया. इस चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 62 सीटों पर जीत दर्ज की. 2015 के मुकाबले सीटें थोड़ी कम जरूर हुई थी, लेकिन तब भी ये किसी चमत्कार से कम नहीं था.

उसकी कई वजहें भी थीं. पहली ये कि 6 महीने पहले ही हुए 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 2014 से भी ज्यादा बड़े बहुमत के साथ लौटी थी. और दूसरी ये कि 70 में से 67 विधानसभा सीटों पर कब्जा होने के बाद भी आम आदमी पार्टी दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर हार गई थी. तीसरी एक वजह ये भी कि 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने चार सीटें जीती थीं. लेकिन 2019 में पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी. पंजाब की संगरूर सीट से भगवंत मान ही इकलौते आम आदमी पार्टी के सांसद थे.

गुरुवार को गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आए. इसमें आम आदमी पार्टी ने पांच सीटों पर जीत हासिल की. इसके साथ ही आम आदमी पार्टी को अब राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल गया है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा, ‘गुजरात के लोगों ने आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी बना दिया. जितने वोट गुजरात में मिले हैं, उसके हिसाब से आम आदमी पार्टी महज 10 सालों में ही देश की चंद राष्ट्रीय पार्टियों में शामिल हो गई है.

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