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कभी संघ मुख्यालय पर तिरंगा फहराने वालों के खिलाफ RSS ने कर दिया था केस, जानें पूरा मामला…

20220803 175058 min
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आजादी की 75वीं वर्षगांठ के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान लॉन्च किया है। पीएम मोदी ने 2 अगस्त को अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स की डीपी में तिरंगा लगाया और सभी देशवासियों से भी ऐसा करने की अपील की। सरकार ने स्वतंत्रता दिवस पर 20 करोड़ लोगों के घर तिरंगा फहराने का लक्ष्य रखा है।

कभी महाराष्ट्र के बाबा मेंढे, रमेश कलम्बे और दिलीप चटवानी ने नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय पर तिरंगा फहराने का लक्ष्य रखा था। यह तीन सदस्यीय दल इस बात से क्षुब्ध था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर भी तिरंगा नहीं फहराया जाता।

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26 जनवरी 2001 को बाबा मेंढे के नेतृत्व में तीन सदस्यीय दल ने अपना लक्ष्य पूरा किया। इसके बाद डॉ. हेडगेवार स्मृति मंदिर की शिकायत पर तिरंगा फहराने वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो गया। यह मामला नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल पहले तक नागपुर की एक निचली अदालत में चल रहा था। अगस्त 2013 में अदालत ने तीन आरोपियों को बाइज्जत बरी किया।

15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बाद संघ मुख्यालय पर 26 जनवरी 2002 को तिरंगा फहराया गया था। इस बीच 52 साल में एक भी बार आरएसएस ने अपने मुख्यालय पर झंडा नहीं फहराया था। आरएसएस को भाजपा का पितृ संगठन माना जाता है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी संघ के प्रचारक रहे हैं।

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आरएसएस पर किताब लिखने वाले प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम का दावा है कि संघ के अंग्रेजी मुखपत्र आर्गनाइजर ने 15 अगस्त, 1947 ने तिरंगे की भर्त्सना करते हुए लिखा था, ”… हिंदुओं द्वारा तिरंगे का कभी सम्मान नहीं किया जाएगा। न ही उसे अपनाया जाएगा। तीन आंकड़ा अपने आप में अशुभ है। एक ऐसा झण्डा जिसमें तीन रंग हों बेहद खराब मनोवैज्ञानिक असर डालेगा और देश के लिए नुकसानदायक होगा।

आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर को नरेंद्र मोदी अपना गुरु मानते हैं। गोलवलकर ने अपनी किताब बंच ऑफ थॉट में तिरंगे के चयन पर सवाल उठाते हुए लिखा है, ”हमारे नेताओं ने देश के लिए एक नया झंडा चुना है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह सिर्फ बहकने और नकल करने का मामला है… भारत एक गौरवशाली अतीत वाला प्राचीन और महान राष्ट्र है। तब, क्या हमारा अपना कोई झंडा नहीं था? क्या इन हजारों सालों में हमारा कोई राष्ट्रीय प्रतीक नहीं था? निस्संदेह हमारे पास था। फिर यह दिवालियापन क्यों?

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