ऐसे हुई थी ‘रवीश की रिपोर्ट’ की शुरुआत, राधिका रॉय ने ईमेल पर रिपोर्टिंग का दिया था ऑफर…

ऐसे हुई थी ‘रवीश की रिपोर्ट’ की शुरुआत, राधिका रॉय ने ईमेल पर रिपोर्टिंग का दिया था ऑफर…
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Ravish Kumar resigns from NDTV: रवीश कुमार (Ravish Kumar) का एनडीटीवी (NDTV) के साथ ढाई दशक का सफर खत्म हो गया है। वह एनडीटीवी इंडिया (NDTV India) में ग्रुप एडिटर के पद पर कार्यरत थे। बुधवार को उन्होंने इस्तीफा देकर चैनल के साथ अपने सभी रिश्ते खत्म कर लिए। इससे पहले एनडीटीवी के संस्थापक प्रणय रॉय (Prannoy Roy) और राधिका रॉय (Radhika Roy) ने चैनल के प्रमोटर ग्रुप आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर के पद से इस्तीफा दिया था।

एनडीटीवी में रवीश द्वारा की गई, जनपक्षधर पत्रकारिता को आज याद किया जा रहा है। रवीश को शुरुआती प्रसिद्धि ‘रवीश की रिपोर्ट’ से मिली थी, जिसमें वह गरीब, मजदूर और हाशिए के लोगों का मुद्दा उठाते थे। हालांकि रवीश के लिए भी रिपोर्टिंग तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। एनडीटीवी में उन्होंने पत्र छांटने के काम से शुरुआत की थी।

रवीश कुमार बिहार के मोतिहारी से दिल्ली में इतिहास की पढ़ाई करने पहुंचे थे। उनका दाखिला देशबंधु कॉलेज में हुआ था। उन्होंने खुद कई इंटरव्यू में बताया है कि वह पढ़ाई में औसत थे, लेकिन लिखने में उनकी रुचि थी। उनके कई शिक्षकों में से एक अनिल सेठी ने उन्हें पत्रकारिता में जाने का सुझाव दिया। हालांकि वह इतिहास से प्रेम करते थे। लेकिन डरते थे कि इतिहास में शोध कार्य कैसे करेंगे। चूंकि रवीश हिंदी माध्यम से पढ़े थे, इसलिए उन्हें लगता था कि उन्हें एकेडमिक्स में नौकरी नहीं मिलेगी। वह सोचते थे कि हिंदी में शोध और लेखन कर कैसे आगे बढ़ पाऊंगा। ऑक्सफोर्ड-कैम्ब्रिज में हिंदी में आवेदन कैसे करूंगा?

इसके बाद रवीश कुछ समय के लिए आईआईएमसी गए लेकिन पाठ्यक्रम समझ न आने की वजह से बीच में ही छोड़ दिया। रवीश अपने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि वह दौर उनके लिए बेचैन करने वाला था क्योंकि वह तय नहीं कर पा रहा थे कि उन्हें क्या करना है। इसी दौरान उन्हें मंगलेश डबराल ने कुछ फ्रीलांस काम दिया। उन्होंने 1994-95 के पुस्तक मेले में पैसों के लिए न्यूजलेटर निकाला।

साल 1996 में रवीश को पता चला कि एनडीटीवी में एक डेली जॉब है। आउटलुक को दिए इंटरव्यू में रवीश बताते हैं कि वहां उन्हें चिट्ठी छांटने का कमा मिल गया। तब डीडी पर गुड मॉर्निंग इंडिया नामक एक शो आया करता था। रवीश इसी शो के लिए आने वाले पत्रों को अलग करने का काम करते थे। पांच महीने यह नौकरी करने के बाद रवीश ने एमफिल में दाखिला ले लिया। लेकिन अब वह इतिहास से अधिक पत्रकारिता में रुचि लेने लगे थे। इसलिए वह फिर एनडीटीवी पहुंच गए। वहां उन्हें अनुवादक की नौकरी मिल गई। जब एनडीटीवी इंडिया लॉन्च हुआ, तो उन्हें डेस्क का काम दिया गया।

डेस्क पर काम करने के दौरान रवीश को एक दिन एनडीटीवी की को-फाउंडर राधिका रॉय का ईमेल आया। रवीश बताते हैं, ”एक दिन राधिका रॉय ने मेल लिखकर मुझसे पूछा कि क्या मैं रिपोर्टिंग करना चाहता हूं। मुझे याद है कि मैंने महमूद फ़ारूक़ी से अपनी ओर से ईमेल का जवाब लिखवाया था। मुझे डर था कि कहीं वह मेरी खराब अंग्रेजी की वजह से अपना फैसला रद्द न कर दें।” बता दें कि रवीश कई बार यह बता चुके हैं कि उन्हें बहुत अच्छी अंग्रेजी नहीं आती।

रवीश बताते हैं कि जब उन्होंने रिपोर्टिंग शुरू की तब यह तय हो चुका था कि बड़े ‘बीट’ कौन-कौन से हैं। कश्मीर, संसद, अपराध, राजनीति जैसे बीट पर पहले से स्थापित लोग काम कर रहे थे। आउटलुक को ‘रवीश की रिपोर्ट’ की शुरुआत की कहानी बताते हुए वह कहते हैं, ”मैं हर शनिवार और रविवार को दिल्ली की बस में घूमने लगा और अपने विचारों को डायरी में लिखने लगा। मैं भजनपुरा और गोविंदपुरी की गलियों में घूमता था। उन छवियों और ध्वनियों को अभी मुख्यधारा की मीडिया में जगह नहीं मिल पाया था। इसलिए मैंने उन सभी अनुभवों में डुबकी लगाकर कहानियां निकालना शुरू कर दिया।

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